छिंदवाड़ा लोकतंत्र में असहमति दर्ज कराना और शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन करना हर नागरिक का संवैधानिक अधिकार है,
लेकिन जब यह अधिकार हिंसा, पत्थरबाजी और सार्वजनिक संपत्ति के नुकसान में बदल जाता है, तो यह आंदोलन नहीं बल्कि कानून-व्यवस्था पर सीधा हमला बन जाता है। हाल ही हुए जंतर मंतर के प्रोटेस्ट में जिस तरह से तैनात पुलिसकर्मियों को निशाना बनाया गया और 100 से अधिक जवान घायल हुए,
वह किसी भी सभ्य समाज में चिंता का विषय है। सुरक्षा बल केवल सरकारी आदेशों का पालन नहीं कर रहे होते, बल्कि वे हमारी और आपकी सुरक्षा के लिए सड़कों पर खड़े होते हैं;
उनके भी परिवार हैं और उनके प्रति यह हिंसक रवैया अत्यंत दुखद है। हफ़्तों तक संयम दिखाने वाले पुलिसकर्मियों पर जानलेवा हमले करना विरोध की सीमा को पार करता है।आप एक तरफ व्यवस्था से सुधार और जवाबदेही की मांग करें और दूसरी तरफ कानून को अपने हाथ में लेकर सड़कों पर अराजकता फैलाएं, ये दोनों बातें एक साथ नहीं चल सकतीं।
जब कोई विरोध प्रदर्शन सोचे-समझे तरीके से सुरक्षा तंत्र को तोड़कर हिंसा पर उतारू हो जाए, तो राजधानी और नागरिकों की सुरक्षा के लिए पुलिस के पास कड़े कदम उठाने की कानूनी और नैतिक मजबूरी बन जाती है।अभिव्यक्ति की आजादी की भी एक तय सीमा होती है और हिंसा को कभी भी नागरिक अधिकार का नाम नहीं दिया जा सकता।समाज को अब यह समझना होगा कि अधिकार और कर्तव्य साथ-साथ चलते हैं;अगर हम कानून के रक्षकों को ही असुरक्षित कर देंगे, तो लोकतंत्र की नींव ही कमजोर हो जाएगी।
















